पुरुष समाज की रूढ़िवादी सोच,घरेलू हिंसा के खिलाफ तापसी पन्नू का ज़ोरदार थप्पड़ [थप्पड़ मूवी रिव्यू]

# Thappad Movie Review  पुरुषात्मक समाज की रूढ़िवादी सोच,जैसे की फिल्म कबीर सिंह में दिखया गया है की आप जिससे प्यार करते हो उसके ऊपर हाथ भी उठा सकते हो यानि की प्यार में सब जाएज़ है इस तरह की सोच और घरेलू हिंसा केखिलाफ तापसी पन्नू की फिल्म थप्पड़ ऐसे समाज पर करारा थप्पड़ जड़ती है। 


पुरुष समाज की रूढ़िवादी सोच,घरेलू हिंसा के खिलाफ तापसी पन्नू का ज़ोरदार थप्पड़ [थप्पड़ मूवी रिव्यू]


इस फिल्म में पावेल गुलाटी है जो पहली बार इतने बड़े रोल में दिखेगे जिन्होंने तापसी पन्नू के पति का रोल निभाया है। कुल मिला कर ये फिल्म एंटरटेनमेंट के लिहाज़ से नहीं बनी है अगर आप इसे देखने जा रहे है तो फिल्म को रूककर पूरी फिल्म ज़रूर देखे क्यूँकी अनुभव सिन्हा जैसे निर्देशक ने इस तरह के सब्जेक्ट को दिखाने  का सफल प्रयास किया है। थप्पड़ फिल्म  कही ना कही ज़हन में अपना असर छोडती है।  

 Thappad Movie Review Duration & Cast and Crew

Release Date-21-FEB-2020
Film Duration: 2 Hr 21 (141 .41  Min)
Genre- Family Drama
Cast (कास्ट): तापसी पन्नू, पावेल गुलाटी, दिया मिर्जा, तन्वी आज्मी, कुमुद मिश्रा, माया सराओ, रत्ना पाठक, गीतिका वैद्य, राम कपूर
Producer (निर्माता) - अनुभव सिन्हा, भूषण कुमार, कृष्णा कुमार
Director (निर्देशक): अनुभव सिन्हा
Story/ Screenplay  (कहानी /पटकथा ): अनुभव सिन्हा, मृण्मयी लागू
Music (संगीत): अनुराग सैकिया, मंगेश धकडे
Cinematographer (छायाकार): सौमिक मुखर्जी
Rating (रेटिंग): ⭐⭐⭐स्टार (में से)

# थप्पड़ मूवी रिव्यू (Thappad Movie full Review)

समाज भले ही कितना बदल जाये लेकिन स्त्री की दशा वैसे ही रहती है चाहे वो एक वर्किंग वीमेन हो या हाउस वाइफ,परुष समाज हमेशा से यही उम्मीद करता है की घर की जिम्मेदारी के साथ रिश्तो को निभाने का पहला दायित्व स्त्री का ही होता है। 

जैसा की इस फिल्म में दिखाया गया है दिल्ली की में रहने वाली अमृता(तापसी पन्नू) अपने पति विक्रम(पावेल गुलाठी) के सपनो में जीती है, जिसके चलते वो अपना सपने भूल चुकी है। जोकि ख़ुद भी अच्छी क्लासिक डांसर रह चुकी है लेकिन अब वो पूरी तरह से अपने पति के सपनो के लिए समर्पित है|  

एक दिन पार्टी में विक्रम अमृता को थप्पड़ मार देता है जिसके बाद उसके सरे सपने चकना चूर हो जाते है अमृता के निस्वार्थ प्यार और सम्मान को अन्दर तक धक्का लगता है चाहे एक ही थप्पड़ ही क्यूँ ना हो वो नहीं मार सकता ?और क्यूँ मारा उसने ये थप्पड़ और कैसे ?इन्ही सवालों को खोजती हुई ये फिल्म अंत तक पहुचती है। 
 
पुरुषात्मक समाज में जिनकी  सोच अभी भी रूढ़िवादी की सिकंजे में लिपटी हुई है उसपे थप्पड़ फिल्म एक करारा तमाचा मरती है ये फिल्म पूरी तरह से रोजमर्रा जिंदगी में आम महिलाओं के साथ होने वाली ज्यादतियों पर है। इस फिल्म में फिल्म के किरदार पुरुषों से नफरत नहीं करते। 

न ही फिल्म पुरुषों को हैवान के रूप में पेश किया गया है। इस फिल्म की कहानी बहुत सिम्पल है जो की इस फिल्म की खूबसूरती है जिस कारण निर्देशक और लेखक जो केहना चाहते थे वो साफ़ साफ़ जेहन तक पहुचता है।  

लेकिन इस चक्कर में फिल्म का पेस बहुत स्लो हो गया है जैसा की फिल्म का पहला हाफ जब तक अमृता (तापसी पन्नू ) को थप्पड़ नहीं पड़ता जब तक फिल्म पेस नहीं पकडती है लेकिन इस इवेंट के थोड़ी देर बाद फिल्म फिर से स्लो हो जाती है। और यही हाल सेकंड हाफ का है।                         

भले ही फिल्म आपको स्लो लगे  लेकिन तापसी पन्नू पावेल गुलाटी कुमुद मिश्रा रत्ना पाठक शाह अन्य सभी कलाकार ने अपनी एक्टिंग से फिल्म को जोड़ के रखा है जिस कारण आप फिल्म के इमोशन से बंधे रहते है फिल्म का म्यूजिक भी फिल्म के सीन के हिसाब से ही बनाया गया है जो इमोशन को इन्हेन्स तो नहीं करता है लेकिन सीन सपोर्ट करता है सौमिक मुखर्जी का केमरा वर्क भी ठीक ठाक है कुल मिलकर फिल्म देखने लायक है। 

पॉजिटिव 

फिल्म को थ्री स्टार (⭐⭐) मिलते है एक स्टार फिल्म के सब्जेक्ट को एक स्टार फिल्म के अभिनय विभाग को और एक स्टार फिल्म की कहानी और निर्देशन को । 

 निगेटिव


एक स्टार फिल्म की लेंथ के कटते है क्यूंकि बहुत से ऐसे सीन थे जो काटे जा सकते थे जिससे फिल्म की कहानी और इमोशन में कोई असर नहीं पड़ता। एक स्टार फिल्म की म्यूजिक के लिए काटता जिसपे और भी काम हो सकता था 


# थप्पड़ मूवी की कहानी (Thappad Movie Story)

थप्पड़ फिल्म की कहानी हमारे समाज की कड़वी सचाई छह अलग अलग किरदारों के जरिए बुनी गयी है। जिसमे फिल्म के मुख्य कहानी अमृता(तापसी पन्नू ) की है जो अपने जीवन में खुश है उसने अपनी मर्जी से ही हाउस वाइफ बनाना चुना है जिसका पति विक्रम (पावेल गुलाठी ) एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता है वो अपने करियर को लेकर काफी महत्वाकांक्षी है। वहीं अमृता का एक ही सपना है की विक्रम के सारे सपने पूरे हो जाएं। सब कुछ अच्छा चल रहा था। 

लेकिन एक दिन विक्रम अपने लंदन जाने की ख़ुशी में घर पे पार्टी रखता है जिसमे विक्रम की अपने ऑफिस के सीनियर से किसी बात पे बहस हो जाती है इसी बीच बचाव में विक्रम अमृता पे हाथ उठा देता है बस फिर क्या था  उस पल से अमृता के दिलो-दिमाग का सुकून छिन जाता है। वो बस यही सोचती रहती है की आखिर विक्रम ने ऐसा क्यूँ किया वो थप्पड़ नहीं मार सकता था और एक दिन वो विक्रम का घर छोड़ने का फैसला कर लेती है 

जिसके बाद उससे हर कोई यही कहता है जाने दो ऐसा हो जाता है मूवऑन करो भूल जाओ यहाँ तक उसकी सास (तन्वी आजमी) से लेकर उसकी अपनी मां (रत्ना पाठक शाह) तक उसे यही समझाते हैं कि शादीशुदा जिंदगी में ऐसी बातें होती रहती हैं और उसे समझौता कर लेना चाहिए। 

घर को बनाने के लिया औरत को ही सहना पड़ता है लेकिन अमृता का कहना है की सब ठीक है लेकिन वो मुझे थप्पड़ नहीं मार सकता जिसके सपोर्ट में उसके पिता( कुमुद मिश्रा  )है वो कहते है अपने दिल की आवाज़ सुनो वो क्या कहती है और वो ही करो। 

इस बीच विक्रम उसे वापस घर बुलाने के लिए एक कानूनी नोटिस भेजता है। अमृता नामी वकील नेत्रा (माया सराओ) के पास जाती है। नेत्रा भी उसे अपने पति के पास वापस लौट जाने की सलाह देती है।

लेकिन अब अमृता क्या करेगी क्या वो हमेशा से आ रहे पुरुष समाज की सोच के आगे जुक जाएगी क्या वो अपने दिल की सुनेगी- यही है फिल्म की कहानी।जिसका अंत वाकई अद्भुत लिखा गया है जिसको आप पहले से सोच नहीं सकते। 

 # थप्पड़ मूवी निर्देशक (Thappad Movie Director)


अनुभव सिन्हा हमेशा से ऐसे सब्जेक्ट चुनते है जो समाज की कडवी सच्चाई को फिल्म के पर्दे से दर्शको के जहन तक पहुच सके जैसे पिंक,मुल्क और आर्टिकल 15 जैसी फिल्मो से उन्होंने ये कर के दिखाया है एक बार फिर अनुभव सिन्हा थप्पड़ लेकर आये है।

थप्पड़ फिल्म में अमृता के अलावा फिल्म में साथ साथ पांच और औरतों के जीवन के अंतर्विरोध दिखाया है। पांच अलग अलग तबके से जुड़ी इन औरतों के जरिए अनुभव ने औरत की हर तकलीफ को परदे पर उतार दिया। जिससे कही ना कही हम कभी ना कही रुबुरु हुए होंगे लेकिन हमने उसे इगनोरे किया होगा। 

फिल्म का ट्रेलर से फिल्म की स्टोरी तो समझ में आती है लेकिन जैसा की फिल्म का नाम है थप्पड़  तो लगता होगा फिल्म में घरेलू हिंसा और मारपीट जैसा कुछ होगा लेकिन फिल्म को बड़े ही खुसुरत तरीके से निर्देशक अनुभव सिन्हा ने एक थप्पड़ तक केन्द्रित रखा है इसलिए फिल्म कही भी मेलोड्रामेटिक मोड  में नहीं जाती है और नहीं फिल्म में कोर्टरूम ड्रामा है बल्कि फिल्म बड़े ही शांत तरीके से अपना सन्देश कहने में कामयाब होती है। 
  
अनुभव सिन्हा और मृणमयी लागू फिल्म की कहानी में छह अलग अलग किरदारों के जरिए हमारे समाज की कड़वी सचाई रखा है। फिल्म का अंत उन सभी किरदारों के अच्छे और बुरे पहलू, मन में चलने वाली उलझनें, द्वंद्व और अंतरविरोधों को न सिर्फ सबके सामने रखती है बल्कि पूरे समाज को एक-एक ऑप्शन भी देकर जाती है, ताकि लाइफ जीने लायक बन सके।

# थप्पड़ मूवी में अभिनय विभाग (Thappad Movie Acting Department)

फिल्म में तापसी पन्नू ने अपने किरदार के साथ न्याय किया है वो अमृता के   किरदार में आम घरों की किसी सामान्य गृहणी जैसी ही लगेंगी। तापसी पूरी तरह अमृता के किरदार में रच-बस गई हैं। फिल्म में तापसी के पास पावरफुल संवाद तो कम थे लेकिन उनकी खामोसी संवाद पे भरी पड़ी है तापसी ने अपनी खामोशी के जरिये अपने दिल का समंदर उड़ेला है।

तो वही पावेल गुलाटी अपने करियर को लेकर महत्वाकांक्षी पति के रोल में काफ़ी जमे है उनका किरदार “विक्रम” ऐसा था जो सिर्फ सिर्फ अपना देखते है और अपनी पत्नी की खुशियों को भूल चुके हैं। जिसको उन्होंने स्क्रीन काफ़ी अच्छे से निभाया है इन दोनों के अलावा थप्पड़ फिल्म में सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं कुमुद मिश्रा जो तापसी के पिता बने हैं। कुमुद की मौजूदगी वाला हर फ्रेम जिंदगी से भरा है।जिनके पास हर सवाल का जवाब है। 

थप्पड़ फिल्म के बाकि कलाकारों ने अपना बेस्ट दिया है जैसे अमृता की वकील(नेत्रा) के रोल में माया सराओ ने बेहद दमदार तरीके से निभाया है माया सराओ ने। नेत्रा जयसिंह एक कामयाब वकील होने के साथ साथ मशहूर न्यूज एंकर मानव कौल की पत्नी हैं और बेहद कामयाब वकील की बहू। दो पुरुषों की कामयाबी किस तरह उसके व्यक्तित्व और अचीवमेंट को दबा रही है इसे वो स्क्रीन पे प्रभावी ढंग से पेश किया है।

 👉क्यों देखें: बेहद उम्दा कहानी के साथ सभी का सशक्त अभिनय और संवाद फिल्म को देखने लायक बनाते है इस फिल्म में महिलाओं को रिश्तो में झूठी खुशी तलाशने के बजाय अपने आत्मसम्मान को चुनने की बात रखती है। 

👉क्यूँ ना देखें: ऐसी तो कोई खास वजह नहीं की ये फिल्म ना देखे हाँ अगर आप एंटरटेनमेंट के लिए देखने जा रहे है तो ये फिल्म आपके लिए नहीं है क्यूंकि ये फिल्म समाज के सीरियस सब्जेक्ट पे है जिसे देखने से जाएदा समझना जरोरी है। 

👉आपको मेरा द्वारा दिया गया फ़िल्म रिव्यु कैसा लगा आप मुझे कमेन्ट बॉक्स में लिख सकते है और अपने सुझाव भी दे सकते है। 

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