इरफ़ान खान के दमदार अभिनय के आगे कमज़ोर साबित होती है अंग्रेजी मीडियम की कहानी [अंग्रेज़ी मीडियम मूवी रिव्यू ]


#Angrezi Medium Movie Review एक पिता और बेटी के भावुक रिश्ते की डोर से बंधी हुई है अंग्रेजी मीडियम फिल्म, ये फिल्म हिंदी मीडियम की फ्रेंचाइजी की अगली कड़ी है।लेकिन जिस तरह हिंदी मीडियम फिल्म की कहानी अपने शीर्षक के साथ के साथ न्याय करती है अंग्रेज़ी मीडियम फिल्म ऐसा करने में नाकाम दिखाती है फिल्म अपनी मूल कहानी से अटकते भटकते हुए अंत तक पहुचती है फिर भी ये फिल्म ख़ास इस वजह से हो जाती है कि इरफान खान फिल्म 'कारवा के बाद पर्दे पर नजर आ रहे हैं। न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर की वजह से वह एक साल तक लंदन में अपना इलाज करा रहे थे।

इरफ़ान खान के दमदार अभिनय के आगे कमज़ोर साबित होती है अंग्रेजी मीडियम की कहानी [अंग्रेज़ी मीडियम मूवी रिव्यू ]


इरफान खान की ये फिल्म दर्शकों को कितनी पसंद आयेगी, और क्या हिंदी मीडियम की ही तरह अंग्रेजी मीडियम को भी दर्शको का वही प्यार मिलेगा?  चलिए आगे जानते है अंग्रेज़ी मीडियम का विस्तार से रिव्यू की ये फिल्म आपको देखनी चाहिए की या नहीं ?


Angrezi Medium Movie Review Duration & Cast and Crew
Release Date-13-March-2020
Film Duration: 2Hr 26 min
Genre- Drama
Cast (कास्ट): इरफान खान, राधिका मदान, करीना कपूर,दीपक डोबरियाल, किकु शारदा,रणवीर शौरी,डिंपल कपाड़िया, पंकज त्रिपाठी
Producer (निर्माता) - दिनेश विजान
Director (निर्देशक): होमी अदजानिया
Writer (लेखक): भावेश मंडलिया, गौरव शुक्ला, विनय छावल, सारा बोदीनार
Music (संगीत): सचिन-जिगर, तनिष्क बागची
Cinematographer (छायाकार): अनिल मेहता
Rating (रेटिंग): 2 .5 ⭐स्टार (में से)


अंग्रेज़ी मीडियम मूवी रिव्यू (Angrezi Medium Movie full Review)

इरफ़ान खान की हिंदी मीडियम साल 2017 में आई थी जिसमे दिखाया गया था की एक पेरेंट्स अपने बच्चे को अच्छे स्कूल में एडमिशन कराने के लिए किन जद्दोजहद से गुजरते है। अंग्रेजी मीडियम फिल्म की कहानी का आधार तो वही है। फर्क है तो बस इतना सा की फिल्म में स्कूल की जगह विदेशी यूनिवर्सिटी में दाखिले की जंग को दर्शाती है।

जिस तरह 'हिंदी मीडियमफिल्म ने सरकारी व प्राइवेट स्कूलों के बीच के अंतर और हर बच्चे को शिक्षा मिलने के अधिकारों की बात की थी। ‘अंग्रेजी मीडियमअंग्रेजी भाषा की नहींबल्कि विदेश की अंग्रेजी संस्कृति पर प्रकाश डालती है। हालांकि उसे पिरोने  के लिए लेखक और निर्देशक ने काफी लंबा रास्ता लिया है।

उदयपुर का रहने वाला एक आम इंसान चंपक बंसल (इरफ़ान खान) अपनी बेटी तारिका  (राधिका मदान) को विदेश पढने भेजने के लिए क्या-क्या पापड़ बेलता है फिल्म की पूरी कहानी इसी के इर्द-गिर्द बुनी गयी है। निर्देशक होमी अदजानिया की अंग्रेजी मीडियम अगर इसी मुद्दे पे बनी रहती तो जाएदा अच्छा होत। 

फिल्म का पहला हाफ अपने मूल शीर्षक से भटक कर दो बंसल भाइयो (चंपक –गोपी उर्फ़ घसीटेराम ) की लड़ाई में उलझा हुआ जायदा नज़र आता है  इस भाग में हालाँकि फिल्म में पिता चंपक  और बेटी तरीका उर्फ़ तारु की अच्छी कमेस्ट्री देखने को मिलती है तारु एक आज़ाद ख्याल है तो वही पिता चंपक अपनी बेटी को ज़माने की हवा नहीं लगने देना चाहता ,तारु बचपन से विदेश जाने के सपने बुनती है लेकिन चंपक उसे अपने से दूर नहीं जाने देना चाहता है ।

सेकंड हाफ में विदेश में रह रहे भारतीयों का संघर्ष दिखाया गया है। कैसे उनके बच्चे 18 साल युवा होने के बाद अपने माता-पिता को छोड़कर अकेले रहने की संस्कृति को अपनाते है। और भारतीय स्टूडेंट्स  का अपना खर्च उठाने के लिए पार्ट टाइम जॉब करते है।  इन जैसे कई मुद्दों को उठाने के चक्कर में असल कहानी गायब होती नजर आई।

वीजा रद होने के बाद दोबारा लंदन जाने के लिए जो रास्ता चंपक और गोपी उर्फ़ घसीटेराम अपनाते हैंवह बचकाना ही लगता है। फिर भी इरफ़ान और दीपक इसे अपनी अदाएगी से फिल कर देते है

इन सबके बीच पिता और बेटी के भावुक कर देने रिश्तों को खूबसूरती से दर्शाया गया है। कैसे एक बाप अपनी बेटी की ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता हैउसका चित्रण करने का प्रयास किया गया है।

बिखरा हुआ स्क्रीनप्ले  निर्देशक होमी अदजानिया संभाल नहीं पाए बल्कि उसे समेटने के चक्कर में वो खास पलो को भूल कर फिल्म के अंत तक पहुच जाते है। इस कारण से फिल्म अपने मूल सन्देश से भटकने के साथ इमोशन को होल्ड करने में कामयाब नहीं होती है।  

फिल्म में बहुत से ऐसे सीन थे जिनका होना ना होना कोई ज़रूरी नहीं था उसे एडिट किया जा सकता था जिसे फिल्म की अवधि कम हो सकती थी पहला भाग ठीक ठाक है तो वही दूसरा भाग थोडा स्लो स्टार्ट होता है फिर रफ़्तार पकड़ता है। 

ओवर आल फिल्म इरफ़ान खान और दीपक डोबरियाल अंत तक देखने लायक बनाते है दोनों की केमिस्ट्री लाजवाब है इसके अलावा राधिका मदान अपने अभिनय से इम्प्रेस करती है फिल्म का इमोशनल क्लाइमेक्स काफ़ी शानदार है जहाँ इरफ़ान अपनी छाप छोड़ते है लेकिन क्लाइमेक्स थोडा पहले आ जाता है। 

# अंग्रेज़ी मीडियम मूवी की कहानी (Angrezi Medium Movie Story)

फिल्म की कहानी शुरू होती है उदयपुर से जहाँ चंपक बंसल (इरफान) अपनी बेटी तारिका  (राधिका मदान) को पत्नी की मृत्यु के बाद अकेले पालता है। वह उसकी हर ख्वाहिश पूरी करता है। चंपक की मिठाई की दुकान है। सामने उसके भाई गोपी उर्फ़ घसीटेराम बंसल (दीपक डोबरियाल) की भी मिठाई की दुकान है। दोनों के बीच पारिवारिक नाम घसीटेराम को लेकर कानूनी विवाद चल रहा है। 

चंपक का वैसे तो परिवार काफ़ी बड़ा दिखाया गया है जो ओरिजिनल घसीटेराम नाम के लेबल को अपनानाने के लिए क़ानूनी जंग लड़ रहा है और इसी बीच गोपी उर्फ़ घसीटेराम बंसल (दीपक डोबरियाल) क़ानूनी जंग जीत जाता है 

एक दिन तारु और चंपक की शर्त लगती है की वो अगर एग्जाम में अच्छे नम्बर लाएगी तो वो उसे लंदन की टूफोर्ड यूनिवर्सिटी जाने से नहीं रोकेगा लेकिन चंपक हर संभव प्रयास करता है की तारु के अच्छे नम्बर ना आये क्यूंकि वो उसे दूर नहीं भेजना चाहता|

तारिका अच्छे नम्बर से पास होती है और उसे अपने कॉलेज की तरफ से टूफोर्ड यूनिवर्सिटी जाने का मौका मिलता हैलेकिन वह उसके पिता चंपक की वजह से हाथ से निकल जाता है। बेटी के लंदन में पढ़ने के सपने को पूरा करने के लिए एक पिता किस तरह का संघर्ष करता हैफिल्म इसी को लेकर आगे बढ़ती है।

एक तरफ चंपक अपनी बेटी के सपने को भी पूरा करना है और उसे डर है की वो उससे दूर हो जाएगी लेकिन फिर भी वो उसे अपने सपने पूरा करने के लिए जी-जान लगाकर पूरा करना चाहत है। इसके लिए वो तिकड़म लगा अपनी बेटी को लंदन में एडमिशन दिलवाने की कोशिश करता है। जिसमे उसकी मदद करता है उसका भाई गोपी (दीपक डोबरियाल) जिसकी चंपक के साथ वैसे तो नहीं बनती लेकिन तारिका की मदद के लिए वो उसके साथ आता है।  

दोनों की मदद करने का अंदाज भी ऐसा है कि वो लंदन की नागरिकता लेने के लिए भी तैयार हो जाते हैं, वो भी नकली पासपोर्ट पर। अब तारिका को लंदन के ट्रूडफोर्ड यूनिवर्सिटी में एडमिशन दिलवाने के लिए कौन-कौन से हथकंडे अपनाए जाते हैं फिल्म उस बारे में है। तो क्या तारिका लंदन की यूनिवर्सिटी में पढ़ पाएगी? क्या चंपक अपने मिशन में कामयाब हो पाएगा? कही चंपक और गोपी का झूठ सभी के सामने तो नहीं आ जाएगा? इन सवालों के जवाब मिलेंगे जब आप देखेंगे डायरेक्टर होमी अदजानिया की फिल्म अंग्रेजी मीडियम। 

# अंग्रेज़ी मीडियम मूवी निर्देशक (Angrezi Medium Movie Director)

निर्देशक होमी अदजानिया इससे पहले बीइंग साइरस, कॉकटेल जैसी फिल्मों का निर्देशन कर चुके जिसमे कॉकटेल फिल्म काफ़ी सफल रही थी लेकिन इस बार होमी हिंदी मीडियम की फ्रेंचाई के सार को समझ नहीं पाए ये उनकी अंग्रेज़ी मीडियम फिल्म देखकर साफ़ पता चलता है ।जिस तरह साकेत चौधरी के निर्देशन में बनी हिंदी मीडियम पब्लिक को बांधे रखने में कामयाब रही थी उस कसौटी पे अंग्रेज़ी मीडियम खरी नहीं उतरती है फिल्म अंत तक बंधे रहने में असफल साबित होती है। 

फिल्म ने एक साथ कई सारे मुद्दे उठाने की कोशिश की है जिसके चलते कहानी कई मौकों पर अपनी लय खोती नज़र आती है। ये बात फिल्म के दूसरे हाफ में सबसे ज्यादा खटकती है क्योंकि तब कई ऐसी चीजें दिखाई गई हैं। जिसका कहानी के बैकग्राउंड में कोई जिक्र नहीं है। जैसे कि फिल्म में करीना और उनकी मां डिपंल के बीच परेशान क्यों रहती है? इस सवाल का जवाब दिया ही नहीं जाता। फिल्म का क्लाइमेक्स और भी ज्यादा दमदार हो सकता था। सबसे खास बात आप फिल्म देख कर अंदाजा लगा सकते हैं कि आगे क्या होने वाला है। 

अंग्रेजी मीडियम में सबसे बड़ी चूक तो यही रह गई कि फिल्म अपने संदेश को दर्शकों तक ठीक अंदाज में पहुचा नहीं पाई। जिस मुद्दे को फिल्म में तूल देनी चाहिए, वो होता दिखाई नहीं दिया। इसके अलावा फिल्म की दूसरी चूक है इसकी कमजोर एडिटिंग।  फिल्म को काफी खींच दिया गया है। इसके ऊपर फिल्म में कई ऐसे बेवजह गाने हैं जिनके चलते फिल्म की लंबाई काफी ज्यादा हो गई है। 

# अंग्रेज़ी मीडियम मूवी में अभिनय विभाग (Angrezi Medium Movie Acting Department)


करीब दो साल के अंतराल के बाद इरफ़ान खान के फैन्स को उन्हें स्क्रीन पे देखने का मौका मिलेगा जिसे वो अपनी जानदार अदायेगी से ये साबित करते है की एक्टिंग के आगे उनके सामने अभी कोई नहीं है लेकिन इरफ़ान खान की दमदार अभिनय को कहानी ने कोई सहारा नहीं दिया बस उनका साथ दिया तो उनके भाई बने दीपक डोबरियाल ने जिन्होंने इरफ़ान के साथ जो जुगलबंदी प्रस्तुत की वो काबिले तारीफ है। 

इरफान खान के अभिनय की बात करें तो वो फिल्म मे हर जगह कमाल नजर आए हैं चाहे फिर कोई इमोशनल सीन हो या हो कोई हंसी-मजाक, वो हर रूप में दर्शको का दिल जीत लेंगे। 
तो वही दीपक डोबरियाल का गोपी उर्फ़ घसीटेराम का रोल आपको हर सीन में हंसने को मजबूर कर देगा. उनकी नेचुरल कॉमिक टाइमिंग है जो हर सीन में जान फूंक देती है। स्क्रीन पर इरफान की दीपक के साथ मस्ती खूब हंसाती भी है और फिल्म की हाईलाइट भी बन जाती है। 

फिल्म में राधिका मदन का काम भी बढ़िया कहा जाएगा। उन्होंने अपने रोल को पूरी शिद्दत के साथ निभाया है. उन्होंने जिस अंदाज में रोल के लिए अपने लहजे पर काम किया है, वो काबिले तारीफ है। उनका कैरेक्टर फिल्म में सही अंदाज में गढ़ा गया है। जिसके चलते उनकी एक्टिंग भी खूब निखरकर सामने आई है। 

लेकिन यही बात करीना कपूर के लिए नहीं कहीं जा सकती. उन्हें फिल्म में एक पुलिस कॉप का रोल तो जरूर दिया गया है लेकिन काम ना के बराबर. उनका फिल्म में होना या ना होना एक समान सा लगता है क्योंकि उनका करेक्टर कहानी को आगे बढ़ाने में कुछ भी करता दिखाई नहीं दिया। 

कपिल शर्मा शो में सभी को हंसाने वाले कीकू शारदा का काम भी औसत ही लगा है. उनके अलावा फिल्म के सह-कलाकरों में सिर्फ रणवीर शौरी कुछ हद तक प्रभावित करते दिखाई दिए हैं. वहीं अनुभवी कलाकार पंकज त्रिपाठी और डिंपल कपाड़िया ने निराश किया है. लेकिन इसमें उनका दोष कम और कहानी का ज्यादा है जिसने उन्हें एक्सपलोर करने का कोई मौका ही नहीं दिया। 


पॉजिटिव
फिल्म 2.5⭐स्टार ही मिलते है एक स्टार फिल्म के बेहतरीन अदाकारी,एक स्टार फिल्म की स्टार कास्ट को तो आधा स्टार फिल्म की कहानी को दे सकते है। 

नेगेटिव
अंग्रेजी मीडियम के ट्रेलर को देख पता चल गया था कि फिल्म विदेशी यूनिवर्सिटी में एडमिशन को लेकर सामने आ रही चुनौतियों पर फोकस करेगी लेकिन ये फिल्म ऐसा करने में नाकाम होती है।  बल्कि फिल्म पिता और बेटी के रिश्ते पर ज्यादा फोकस करती है  इसके चलते फिल्म अपने मूल मुद्दे से भटक सी गई।  

दूसरा इतनी अच्छी स्टारकास्ट होते हुए भी सभी के साथ न्याय नहीं कर पाई है तीसरा किसी भी फिल्म को सही मायनों में तभी सफल कहा जा सकता है जब वो अपने मैसेज को दर्शकों तक सही अंदाज में पंहुचा सके। लगता है निर्देशक मुद्दे की गहराई को समझ नहीं पाये।  

👉क्यों देखें: फिल्म अंगेजी मीडियम का प्लस पॉइंट एक ही है वो इरफ़ान खान और दीपक डोबरियाल का मजबूत अभिनय वरना फिल्म में ऐसी कोई खास वजह नहीं है अगर आप इन दोनों की बेहतरीन अभिनय की जुगलबंदी देखना चाहते है तो ये फिल्म देख सकते है लेकिन हिंदी मीडियम फिल्म से इसकी तुलना ना करे आपको मायूसी होगी।  

👉क्यूँ ना देखें: कोरोना वायरस की महामारी के वक़्त घर से ज़रूरी ना हो तो ना निकले, अगर इस फिल्म को नहीं भी देखेंगे कुछ नहीं बिगड़ेगा,फिर भी ये फिल्म देखनी ही तो दिमाग मत लगाना तो अच्छी लगेगी। 


👉आपको मेरा द्वारा दिया गया फ़िल्म रिव्यु कैसा लगा आप मुझे कमेन्ट बॉक्स में लिख सकते है और अपने सुझाव भी दे सकते है। 


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