गज़ब है प्राइसलेस जोड़ी की कहानी [Gulabo sitabo फिल्म समीक्षा]

Gulabo Sitabo film review – सदी के महानायक अमितभ बच्चन के साथ आयुष्मान खुराना की जोड़ी कमाल कर सकती थी? अगर कहानी में उनके किरदारों पे कुछ अच्छे से काम किया होता | फिर भी गुलाबो सीताबो की कहानी क्लासिक फिल्मो की याद दिलाती है जहाँ सब्जेक्ट हीरो होता था | लेकिन क्या इस दौर में ऐसी फिल्मे को कामयाब हो सकती है?

गज़ब है प्राइसलेस जोड़ी की कहानी [Gulabo sitabo फिल्म समीक्षा]

गुलाबो सीताबो किरायेदारो और मकान मालिक के बीच खट्टी मीठी और तीखी नोकजोक की कहानी है। जिसे निर्देशक सूजित सरकार और लेखक जूही चतुर्वेदी ने फ़ातिमा महल के इमोशनल ऐंगल को जहन में रख कर बुना है। कहानी का बेक ग्राउंड लखनऊ रखा है। खैर आईए आगे पढ़ते है कि इस फिल्म को आपको देखनी चाहिए कि नहीं?

Gulabo Sitabo Film Review Duration & Cast and Crew
Release Date-12-June-2020
OTT – Amazon Prime Video (अमेज़न प्राइम वीडियो)
Film Duration: 124 min 
Genre- Comedy Drama
Cast (कास्ट): अमिताभ बच्चन,आयुष्मान खुराना,विजय राज,बृजेंद्र काला,
फारुख जाफर
Producer (निर्माता) - रॉनी लाहिड़ी,शैल कुमार
Director (निर्देशक): शूजित सिरकार
Writer (लेखक): जूही चतुर्वेदी
Music (संगीत): शान्तनु मोईत्रा
Cinematographer (छायाकार): अविक मुखोपाध्याय
Rating (रेटिंग): ⭐⭐ स्टार (में से)

#गुलाबो सीताबो फिल्म की समीक्षा

गुलाबो सीताबो फिल्म के रिलीज़ से पहले अमिताब बच्चन के गेटउप और मेकअप की बड़ी तारीफ हो रही थी | हर कोई उनके इस नए लुक को सिल्वर स्क्रीन पे देखना चाहत रखे हुए था मुझे भी बड़ी उम्मीद थी शायद निर्देशक शूजित सरकार कुछ नया धमाल करने वाले है |क्यूंकि इस फिल्म में अमिताब की जोड़ी आयुष्मान के साथ थी तो क्रियोसिटी और बढ़ जाती है लेकिन फिल्म देखने के बाद ऐसा नहीं लगता की कुछ नया देखा हो, कुछ ऐसा जिसे आपने पहले कभी पढ़ा सुना न हो|

गज़ब है प्राइसलेस जोड़ी की कहानी [Gulabo sitabo फिल्म समीक्षा]


खैर अमिताभ बच्चन को मिर्ज़ा के रूप में देखना अच्छा लगता है ,जो बेदम कैरेक्टर में भी जान फूंक देते है | सच में अगर अमिताभ बच्चन इस रोल ,में ना होते तो इस फिल्म को आप 20 मिनट से जाएदा नहीं देख सकते| 

आयुष्मान खुराना के लिए इस फिल्म से अच्छी ख़बर नहीं है |ऐसा नहीं की उन्होंने अच्छा काम नहीं किया वो एक मझे हुए कलाकार है वो इस फिल्म में भी अपना बेस्ट देते है और अच्छा कर सकते थे अगर और अच्छा उनका कैरेक्टर लिखा गया होता |

फिल्म को देख कर दूरदर्शन की याद आ जाएगी जब क्लासिक फिल्मे आया करती थी जिन्हें हम उस वक़्त नहीं देख पाए| 

मेरे हिसाब से ये फिल्म एक ख़ास वर्ग के लिए है जिन्हें इस तरह की क्राफ्ट फिल्मे पसंद है |

निर्देशक शूजित सरकार और लेखक जूही चतुर्वेदी इससे पहेले पिकू जैसी इमोशनल हिट फिल्म दे चुके है |लिहाजा उनसे उम्मीद थी अक्टूबर के फैलियर के बाद वो एक अच्छी फिल्म देगे लेकिन ऐसा महसुसू नहीं होता |आपको फिल्म देखने के बाद ऐसा लगेगा अच्छा हुआ ये फिल्म हम थियेटर देखने नहीं गए |

अब बात करे सिनेमेटोग्राफी की तो अविक मुखोपाध्याय ने अच्छा काम किया है शायद ही पुराने लखनऊ को इससे बेहतर किसी ने फिल्माया होगा |म्यूजिक की बात करे तो वो भी औसत से कम ही है कोई भी गाना गुनगुनाने के लिए याद नहीं रहता |

गज़ब है प्राइसलेस जोड़ी की कहानी [Gulabo sitabo फिल्म समीक्षा]

#गुलाबो सीताबो फिल्म की कहानी 

कहानी है लखनऊ में स्थित, 100 साल पुरानी हवेली फातिमा महल की जो पूरी तरह से जर्जर और खंडहर हो चुकी है,फिर भी उस महल में कई परिवार किरायेदार के तौर पे रहते है | जो 30-70 रुपये के रूप में मामूली सा किराया 78 वर्षीय मिर्ज़ा (अमितब बच्चन ) को देते हैं। लेकिन उनमे से एक है जो कई महीनो से किराया नहीं दे रह है वो है बांके रस्तोगी (आयुष्मान खुराना ) जो न तो समय पर किराया देता है और न ही हवेली खाली करता है ।

इसी के चलते मिर्ज़ा और बांके के बीच रोजाना बहस हुआ करती है |तंग दोनों ही आ चुके है लेकिन छोड़ना कोई नहीं चाहता | बस मिर्ज़ा एक ही सपना सजोये हुए है की उसकी बेगम उर्फ़ फ़ातिमा बेगम (फ़ारुख़ जाफ़र) जो उससे उम्र में तकरीबन 17 साल बड़ी है उसके इंतकाल के बाद हवेली मिर्ज़ा के नाम हो जाएगी तब वो सब को बहार निकाल देगा |

एक दिन बांके शौचालय की ईंट की दीवार तोड़ देता है बस फिर क्या था उसको रिपेयर करने के चक्कर में मिर्ज़ा और सभी किरायेदार पुलिस थाने पहुच जाते है| जहाँ उनके इस झगड़े में ज्ञानेश मिश्रा (विजय राज) की एंट्री होती है जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (लखनऊ सर्कल) के अधिकारी है |

 वो अपनी सरकारी धमक को दर्शा कर 100 साल पुरानी हवेली फ़ातिमा महल को राष्ट्रीय धरोहर संपत्ति बनाने की जुगत में लग जाता है | जिसमे बांके को वो इस साजिश में मिला लेता है |

लेकिन मिर्जा भी कोई मूर्ख नहीं है वो सारा मामला अपने वकील क्रिस्टोफर क्लार्क (बृजेन्द्र काला) को सुनाता है । बस फिर क्या था वकील क्रिस्टोफर मिर्ज़ा को कहता है की वो पॉवर ऑफ़ अटर्नी पे बेगम के दस्तखत ले आये जिससे बेगम के मरने के बाद हवेली उसके नाम हो जाये |

कुल मिलकर सारा खेल इस फ़ातिमा महल का ही है |जिसके पीछे बरसो से रह रहे किरायेदार अपना मान कर मालिकाना हक़ जमाते है ,तो वही मिर्ज़ा भी बरसो से ये सपना देख रहा की बेगम के बाद ये हवेली उसकी हो जाएगी | एक जगह मिर्ज़ा कहता भी “इस हवेली के चक्कर में उसने कोई औलाद भी नहीं की’ इससे समझ सकते है मिर्ज़ा का उस हवेली के प्रति प्यार |

तो क्या मिर्ज़ा उस हवेली का मालिकाना हक़ ले पायेगा ?बांके और ज्ञानेश मिश्रा साथ मिलकर क्या नया गुल खिलने वाले है ? आखिर क्या होगा उस फ़ातिमा हवेली का ?इन सवालो को देखने के लिए गुलाबो सीताबो को अमेज़न प्राइम वीडियो(Amazon Prime Video) पे स्ट्रीम कर सकते है |

निर्देशन

अब बात करे निर्देशन की तो शूजित सिरकार ने इस फिल्म का हाल वरुण धवन की अक्टूबर फिल्म जैसा ही ट्रीटमेंट दिया है की फिल्म न शुरू होती है ना ख़तम होती है  बस फिल्म के अंत के 20 मिनट आपको लगता है की फिल्म में कुछ था जो याद रह जाये वरना बाकी टाइम आप कुछ काम कर सकते है लौट कर आएंगे तो फिल्म की कहानी वही की वही मिलेगी | 

लेखक जूही चतुर्वेदी और शूजित सिरकार को सोचना होगा पिंकू जैसा जादू हर बार नहीं चल पायेगा उसके लिए कंटेंट पे काम करना होगा |
फिल्म हद से जाएदा स्लो है जिसकी जिम्मेदारी निर्देशक के साथ फिल्म एडिटर की भी बनती है, आखिर उसने क्या किया ?

शूजित सिरकार कुल मिलकर गुलाबो सीताबो में पूरी तरह से फ़ैल हो गए है  कल्ट बनाने के चक्कर में फिल्म कुछ और ही बन गयी है |

अभिनय 

अभिनय की बात करे तो सारा जादू अमिताभ बच्चन ही ले गयी है उनका मिर्ज़ा का गेटउप आकर्षित भी करता है और बांधे रखने की कोशिश भी करता है |वाकई ये अमिताभ ही ही जो बेदम पात्र में जान फूंक देते है | बाकी उनके पास अच्छे संवाद थे ही नहीं जिससे वो कोई कमल दिखा पाते |

इसके उलट फिल्म में कम सीन के बावजूद मिर्ज़ा की बेगम बनी फारुख जाफर के पास अच्छे संवाद थे उनका उनका ट्रैक जहां आपको पसंद आएगा वो जब स्क्रीन पर आती हैं दिल जीत लेती हैं और कुल मिलाकर कहानी की जान बेगम ही हैं जो फिल्म के आखिरी 15 मिनट में जान फूंकती हैं|

अब बात करे आयुष्मान खुराना की तो उनसे बाड़ी उम्मीदे थी क्यूंकि पहली बार वो बिग बी के साथ स्क्रीन साझा कर रहे थे लेकिन उनसे भी निराशा ही मिलती है वो लखनवी किराएदार के किरदार में ढालने की कोशिश करने में पहली बार जूझते दिखाई देते और अंत तक किरदार को सही तरीके से पकड़ नहीं पाए |


सपोर्टिंग कास्ट ने भी फिल्म को सपोर्ट नहीं किया है |चाहे वो मिर्ज़ा के वकील के किरदार में बृजेंद्र काला हों या फिर पुरातत्व विभाग के अफसर के किरदार में विजय राज़ हो। दोनों का किरदार में धार नहीं थी बल्कि टाइम पास करते दिखे दोनों किरदार |और अगर बात करे फिल्म में बांके ( आयुष्मान ) की बहन के किरदार सृष्टि(गुड्डो) ने अच्छा काम किया है वो फिल्म को थोड़ी मज़बूती देने की कोशिश करती है। उनके हिस्से आए सीन अच्छे हैं और वो उन्हें बखूबी निभाती हैं।


मेरे विचार गुलाबो सीताबो फिल्म के लिए

फुर्सत के समय इस फिल्म को देखिये शायद कुछ ख़ास मिल जाये,ये तो अच्छा है गुलाबो सीताबो डिजिटल रिलीज़ हुई वरना सिनेमाहाल से निकल कर शायद निर्देशक और लेखक को गरियाने का मन करता |