विद्युत जामवाल की मूवी यारा देखने से पहले हमारी समीक्षा पढ़े| Yaara Film Review

Yaara film,को अगर आप ये सोच कर देखने की उम्मीदे लगाये है की इस फिल्म में हमेशा की तरह विद्युत जामवाल के एक्शन आपको रोमांचित कर देगे तो आपको थोड़ी सी मायूसी हाथ लगेगी | चलिए जानते एक्शन तो ना के बराबर है तो क्या ख़ास है यारा फिल्म में?जिस कारण से ये फिल्म आपको देखनी चाहिए ? 


विद्युत जामवाल की मूवी यारा देखने से पहले हमारी समीक्षा पढ़े| Yaara Film Review

यारा मूवी समीक्षा

2011 में आई निर्देशक ओलीवर मार्सेल(Oliver Marcel) की फ्रेंच फिल्म लास लुयुने (A GANG STORY ) का हिंदी रिमेक है |जिसका निर्देशन तिग्मांशु धुलिया ने किया है | तिग्मांशु धुलिया बेहतरीन निर्देशक के साथ अच्छे कहानीकार भी है,पूर्व में उन्होंने बेहतरीन फिल्मे दी है| साहब बीवी और गेंगस्टर,पान सिंह तोमर जैसी सफल फिल्मे देने के बाद मिलन टाकिज जैसी फ्लॉप भी दे चुके है |तिग्मांशु की फ्लॉप फिल्मो की फेहरिस्त में यारा(Yaara) का नाम भी जुड गया है| 

खैर इस फिल्म में एक मात्र सेंटर अट्रैक्शन विद्युत जामवाल ही है जिनसे उम्मीद होती है की वो स्क्रीन पर अपने एक्शन से सभी को रोमांचित कर देंगे | लेकिन इस फिल्म से ऐसी उम्मीदे लगाना आपकी मायूसी का सवब बन जायेगा |

यारा फिल्म 4 दोस्तों की कहानी कहती है | जवानी में चौकड़ी गैंग के नाम से फेमस चारो दोस्त कच्ची शराब,अवैध हथियार,और तस्करी जैसे क्रिमनल एक्टिविटी में लिप्त है |



सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन एक दिन अचानक एक घटना के बाद से सब बिछड़ जाते है | और लगभग 20 साल के बाद चारो फिर से मिलते है| लेकिन सब कुछ बदल चूका है और कोई है जो इन चारो को समाप्त करना चाहता है |


कहानी जीतनी मैंने सरल करके आपको बता दी है वैसी है नहीं,तिग्मांशु ने कहानी में जाएदा ट्रैक्स गुसेड दिए है | जिस कारण से यारा फिल्म स्लो भी हो जाती है और भटकती हुई अंत तक पहुचती है | इस फिल्म का अंत क्या होने वाला है वो आपको पहले से अंदाज़ा हो जायेगा | 


कुल मिलकर फिल्म किसी भी तरह का मनोरंजन करने में असफल होती है | जिस तरह से यारा फिल्म के ट्रेलर को देख उम्मीद लगायी जा रही थी तिग्मांसू धासु फिल्म लेकर आ रहे है लेकिन रिलीज़ के बाद मायूसी ही हाथ लगी है 2 घंटा 10 मिनट झेलना भरी हो जाते है| न तो फिल्म में चारो दोस्तों की दोस्ती कोई रंग जमा पाई और न ही तिग्मांशु कोई नया फ्लेवर दिखा पाए | बस लगता है की फिल्म को बीच में ही छोड़ दिया जाये | बस विद्युत जामवाल स्क्रीन पर दीखते है तो उम्मीद होती है की कुछ तो अच्छे सीन आयेंगे ? लेकिन इसी आस में फिल्म का the end हो जाता है और आप ठगे हुए से महसूस करते है |

फिल्म में खास क्या है  


फिल्म की खास पहलू की बात करे तो फिल्म का शूटिंग स्टाइल खासकर जब फिल्म फ्लैशबैक में जाती है ,तो तिग्मांशु ने फिल्म को रेट्रो लुक(Retro look) दिया है जो देखने अच्छा लगने के साथ फ्रेश भी नज़र आता है| कुल मिलकर फिल्म की सिनेमेटोग्राफी काफी अच्छी है |


एक्टिंग के जरिये विद्युत जामवाल,अमित साद ,विजय वर्मा और केनी फिल्म को बाधे रखने की कोशिश करते है लेकिन लचर कहानी उनका सपोर्ट नहीं करती| 


यारा फिल्म की कहानी

फिल्म की कहानी शुरू होती है परमवीर उर्फ़ फागुन  (विद्युत जामवाल) से जहाँ वो कार से कही जा रहा है,वो कार के डैश बोर्ड से गन निकलता है |जहाँ पर वोईस ओवर में ये लाइन फागुन की आवाज़ में चल रही है हम चार थे|एक-दूसरे के पहरेदार थे|वक्त हमसे नाराज था,पर इस बार वह हमसे नाराज नहीं है| उसे हमसे नफरत है| क्या है इस लाइन का मतलब पूरी फिल्म इस का जवाब ढूंढती है |

कहानी उन चार दोस्तों की है जिनकी परवरिश अपराध की दुनिया में हुई है जिनका इस्तेमाल भारत–नेपाल सीमा पर तस्करी करने के लिए किया जाता है | चारो का चौकड़ी गैंग बचपन से जवानी की देहलीज़ पर कदम रखता है सबकुछ बदला लेंकिन नहीं बदला तो चौकड़ी गैंग का अपराध करने का स्टाइल और दोस्ती | 

चौकड़ी गैंग को लीड करता है फागुन गदेलिया(विद्युत जामवाल) ,बाकि इस गैंग में मितवा (अमित साध ),बहादुर (केनी) और रिजवान (विजय वर्मा) | ये सभी अपराध की दुनिया अपने गैंग का अच्छा खासा दबदबा बना लेते है |

ये गैंग तस्करी, कच्ची शराब और हथियारों की सप्लाई करता है | लेकिन फिर एक दिन फागुन की लाइफ में सुकन्या (श्रुति हसन) की एंट्री होती है | बस दोनों को प्यार हो जाता है और एक दिन सुकन्या के जन्म दिन मानाने सभी लोग एक गाव में पहुचते है | 

जहाँ पुलिस की मुखबरी की सुचना से गाँव में पहुच जाती है | और वो चारो पुलिस के हत्थे चढ़ जाते है | पुलिस उन सब को खूब टॉर्चर करती है| अदालत में उन्हें अलग-अलग सजा होती है| और सभी को अलग-अलग जेलों में रखा जाता है|

20 साल की सजा काटने के बाद फागुन,बहादुर और रिजवान अपराध की दुनिया छोड़ कर बिल्डर के बिजनेस में कूद जाते है | लेकिन मितवा का कोई अत पता नहीं होता | 

एक दिन अचानक मितवा को जॉइंट कमिशनर सीबीआई सरदार जगजीत मितवा को गिरफ्तार कर लेता है | मितवा के पीछे शकील और दुर्रानी जैसे नामी गैंग्स्टर पीछे लगे है | जो किसी भी हालत में मितवा को ख़तम करना चाहते है |


जॉइंट कमिशनर सीबीआई सरदार जगजीत के वार्निंग के बावजूद फागुन,बहादुर और रिजवान पुलिस के हाथो से तो बचा लेते है लेकिन वो सीधे शकील और दुर्रानी के दुश्मन बन जाते है | फिर शुरू होता है खुनी खेल जिसमे रिश्तो में विश्वासघात की कलाई खुलती है | किसने किसको दिया धोखा इसे जानने के लिए आपको ZEE5 पर यारा देखनी होगी |


मेरे विचार


तिग्मांशु एक अच्छे निर्देशक है लेकिन बीते कुछ वर्षो में उनका स्टोरी सिलेक्शन अच्छा नहीं रहा| बुलेट राजा,राग देश, और मिलन टाकिज जैसी फ्लॉप फिल्मो से उन्हें सोचना चाहिए की पब्लिक क्या देखना चाहती है | वो तो भला हो  डिजिटल प्लेटफार्म का की इस फिल्म को दर्शक मिल जायंगे |

फिल्म कई मुद्दों और कहानियो में बट गयी है इसलिए कहानी सही रफ़्तार नहीं पकड़ पाई | कही फिल्म तेज़ भागती है तो कही फिल्म की कहानी बढती ही नहीं है | कुल मिलकर निर्देशक तिग्मांशु फिल्म का ट्रीटमेंट बहुत ही ठंडा साबित हुआ|

इस फिल्म में केवल विद्युत के किरदार पर ही ढंग से काम किया गया है | बाकि के किरदारो में ध्यान नहीं दिया गया है |

जिस कारण से विजय वर्मा अमित साध जैसे ऐक्टर भी अपने रोल में प्रभाव नहीं छोड़ पाते|

इस फिल्म श्रुति हासन भी कोई असर नहीं छोड़ पाती है | बड़े बाप की बेटी होने के बावजूद नक्सली का साथ देने वाली सुकन्या के किरदार को हल्का ही लिखा गया है बल्कि फिल्म में वो बहुत कुछ झेलती है |

कुल मिलकर तिग्मांशु कलाकारों का सही इस्तेमाल नहीं कर पाए| फिल्म के गीत-संगीत में कोई खास एहसास नहीं जगा पता है | सिनेमैटोग्राफी काफी अच्छी है| लेकिन ये एक मात्र वजह नहीं बन सकती है की फिल्म देखि जाये ?

अगर आपके पास 2 घंटा समय खली है तो ही इस फिल्म को देखे वरना कोरोना काल के अनलॉक 3 में बहुत से काम है  जिन्हें आप कर सकते है