लुटीपिटी कहानी कुणाल खेमू का औसत अभिनय लूटकेस फिल्म को उबाऊ बनता है |

Lootcase Movie Review: पैसो का भरा हुआ लाल रंग का सूटकेस, एक रात नन्दन कुमार (कुणाल खेमू) को मिलता है| फिर जो भूचाल मिडल नन्दन कुमार की ज़िन्दगी में आता है| फिल्म की पूरी कहानी उसी लाल सूटकेस पर केन्द्रित है| पैसो की तंगी से झूझ रहा नन्दन क्या करेगा उस लाल सूटकेस का? और किसका है ये सूटकेस ? इसको जानने के लिए पढ़े हमारा लूटकेस फिल्म मूवी रिव्यू


लुटीपिटी कहानी कुणाल खेमू का औसत अभिनय लूटकेस फिल्म को उबाऊ बनता है |




लूटकेस फिल्म की फुल समीक्षा

शुक्रवार 31 जुलाई को ऑनलाइन प्लेटफार्म डिजनी हॉटस्टार पर कुणाल खेमू की लम्बे इन्तेजार के बाद रिलीज़ हो गयी है |लेकिन जैसा की ट्रेलर को देख कर उम्मीद की जा रही थी की उस कसौटी पर खरी नहीं उतरती है लूटकेस फिल्म

शुक्र है की ये फिल्म डिजिटल रिलीज़ हुई है वर्ना थियेटर में इस फिल्म को दर्शक मिलने मुश्किल हो जाते| लूटकेस फिल्म की कहानी एक लाल रंग के पैसो से भरे सूटकेस की लूट पर आधारित है जो की गलती से मिडिल क्लास नन्दन कुमार(कुणाल खेमू) के हाथ लग जाता है | 

आर्थिक मोर्चे पे झूझ रहे ननंद की ज़िन्दगी में क्या उथल पुथल होता है ? इस ट्रैक पर कई फिल्मे आ चुकी है अभी कुछ दिन पहले netflix पर चोक्ड पैसा बोलता है ,और डिस्नी हॉट स्टार की विनय पाठक की छप्पर फाड़ के फिल्म की कहानी को देखे तो बस डीमोनेटाइजेसन के प्लाट को हटा दे तो फिल्म हु-ब-हु ही दिखती है | फिल्म का सेंटर पॉइंट मिडिल क्लास फॅमिली ड्रामा जो पैसो की तंगी से जूझ रहा है |

कुल मिलकर फिल्म में कुछ नया नहीं है जिस कारण फिल्म को देखा जाये | हाँ अगर आप कुणाल खेमू को बहुत दिन बाद स्क्रीन पर कॉमेडी करते हुए देखना चहाते है तो फिल्म देख सकते है लेकिन आपको निराशा ही हाथ लगेगी| इस फिल्म में कुणाल के साथ रसिका दुग्गल (मिर्ज़ापुर फेम )और गजराज राव भी है लेकिन सभी का अभिनय कहानी के आभाव के कारण औसत ही लगता है| म्यूजिक न मात्र का ही है और सिनेमेटोग्राफी भी ठीक ठाक ही है |



क्या है लूटकेस मूवी की कहानी?


कहानी शुरू होती है नन्दन कुमार (कुणाल खेमू ) से, वो अपनी रात की ड्यूटी करके वापस लौट रहा है | नन्दन एक न्यूज़ पेपर में टेकनिशन के तौर पर काम करता है | उसे अचानक रास्ते में पेशाब लगती है और वो पब्लिक टॉयलेट जाता है जहाँ उसे एक लाल रंग का पैसो से भरा सूटकेस मिलता है| 

2000 के नोटो से भरे सूटकेस को देख नंदन की आँखे चौंधिया जाती है |वो घबरा के पूछता है देखो मैं आखरी बार पूछ रहा हूँ ये बैग किसका है लेकिन किसी का जवाब नहीं आता |

इसके बाद ओपिनिग टाइटल शुरू होता है जिसके बाद ये दिखया गया है की आखिर ये सूट केस, मुंबई के मंत्री पाटिल(गजराव ) अपने खास गुर्गे माफिया ओमार(सुमित निझावन) के हाथो किसी को देने को भेजते है |


लेकिन इसकी भनक ओमर के दुश्मन बाला राठोर (विजय राज ) को लग जाती है | उस बैग को उड़ने के लिए वो अपने आदमी को भेजता है | लेकिन उस रात क्या होता की वो बैग पब्लिक टॉयलेट पहुच जाता है और वहां से नंदन (कुणाल खेमू ) के हाथ लग जाता है | इसे जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी |

लेकिन 2000 के गुलाबी नोटों से अब नंदन कुमार की बेरंग ज़िन्दगी भी गुलाबी होने लगती है | और इस बैग के पीछे मुंबई में दो गुटों में गैंग वॉर होने लगती है| तब यहाँ एंट्री होती है इंस्पेक्टर माधव कोटले (रणबीर शोर्री ) की ,  जो मंत्री पाटिल का खास है | उसके आने के बाद कहानी में कई नए ट्विस्ट आते है |


वैसे आपको बता दे फिल्म की कहानी बहुत सिंपल है आपको दिम्गा नहीं लगाना पड़ेगा| यहाँ तक की कहानी को परसेंट करने का तरीका भी पुरानी  फिल्मो जैसा ही है |



निर्देशन

आब बात कर लेते है इस फिल्म के निर्देशन की, तो इस फिल्म का निर्देशन किया है राजेश कृष्णनन ने,जो की फिल्म की ओपिंग अच्छी देने में कामयाब होते है| लेकिन राजेश फिल्म की कहानी को स्टेब्लिश करने में काफी समय लगा देते है |जिस कारण फिल्म स्लो हो जाती है (डिजिटल देखने में आपके पास फारवर्ड करने का आप्शन है चाहे तो इस्तेमाल कर सकते है ) और फिर कहानी जैसे –जैसे आगे बढती है तो फिल्म  किरदारों के ओवरडोज अभिनय में फंस कर रह जाती है |


एक आद सीन को छोड़ दे तो जिसमे हँसी आती है लेकिन बाकी सीन पुराने से दीखते है कुछ नया नहीं है | कुल मिलकर लूटकेस फिल्म में राजेश कृष्णनन का निर्देशन औसत ही है |कुछ कमाल नहीं दिखा पाए


अभिनय

अब फिल्म के अभिनय की बात करे तो किसी ने कोई कमाल नहीं किया है इस फिल्म में फिर चाहे कुणाल खेमू हो ,या उनकी पत्नी बनी रसिका दुग्गल ही क्यूँ न हो सभी की एक्टिंग ठीक ठाक ही है | थोड़ी बहुत हंसी फिल्म में पति पत्नी के नौक झोक में ज़रूर आ सकती है |

बाकी मंत्री पाटिल बने गजराज राव भी औसत अभिनय में बंधे नज़र आये |हालंकि वो भ्रष्ट मंत्री के तौर में अच्छे लगे है |लेकिन उनकी पिछली फिल्मो के अभिनय से उनसे उम्मीद और बढ़ जाती है |जिसे वो इस फिल्म में पूरा नहीं कर पाते है|


बाला राठोर के रूप में विजय राज कुछ नया एक्सपेरिमेंट करते है जैसे नेशनल जियोग्राफी चैनल का प्रेमी होना और अपने सामने वाले दुश्मन को जानवर के बायोलॉजिकल नाम से पुकारना कुछ नया है लेकिन हँसी नहीं आती है | रणबीर शोरी के माधव कोटले के किरदार को भी वेस्ट कर दिया है वो भी अपना रंग नहीं जमा पाए |


मेरे विचार


हाली फुलकी कॉमेडी के साथ 2 घंटा 11 मिनट थोड़े से भरी लगते है| फिल्म के लेंग्थ थोड़ी कम हो सकती थी | सीन काफी लेंगती है जिन्हें शोर्ट क्रिस्प किया जा सकता था | ये सब एडिट टेबल पर भी हो सकता था | खैर अगर फिल्म  की ओपन रखी गयी है आप जब चाहे फारवर्ड कर के अंत देख सकते है | पूरी फिल्म देखने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी |