विद्युत जामवाल का दमदार एक्शन,कहानी की कमी खलती है Khuda Hafiz Movie Review

Khuda Hafiz Movie Review: विद्युत जामवाल की फिल्म में एक बार कहनी ना हो तो कोई बात नहीं लेकिन दमदार एक्शन हो तो पैसा वसूल हो जाता है लेकिन हॉट स्टार डिस्नी पर 14 अगस्त को रिलीज़ हुई खुदा हाफ़िज़ (Khuda Hafiz) फिल्म में दोनों ही नदारत है | ऐसा कुछ नहीं है फिल्म में जिसे पहले कभी देखा ना हो | चलिए जानते है क्या ये फिल्म आपको देखनी चाहिये की नहीं?




खुदा हाफिज समीक्षा 

विद्युत जामवाल को अपने दमदार एक्शन के लिए जाना जाता है इसलिए बॉलीवुड में लगभग एक दशक गुजार चुके विद्युत की इमेज भी एक्शन हीरो की ही है | दर्शक उनके इसी एक्शन के मुरीद भी है| लेकिन लगता है की विद्युत इस इमेज से बहार निकल कर लार्जर-दैन-लाइफ जैसे रोल को आज कल जाएदा तरजीह दे रहे है तभी तो कुछ दिन पहले ZEE5 पर रिलीज़ हुई यारा (YAARA) में बिना एक्शन के दिखे जिसके लिए वो जाने नहीं जाते है | विद्युत् जामवाल मतलब एक्शन |

यही हाल खुदा हाफ़िज़ फिल्म का है इसमें भी वो आम इंसान समीर चौधरी का रोल अदा कर रहे है जिसकी बीवी नर्गिस (शिवालीका ओबेराय) नोमन देश में जिस्म फरोशी के जाल में फंस जाती है | जिसे छुड़ाने के लिए समीर नोमान देश पहुचता है फिल्म का ट्रेलर देख कर लगा था की कहनी हो न हो लेकिन विद्युत जामवाल का एक्शन तो जरुर देखने को मिलेगा | लेकिन फिल्म देख कर विद्युत जामवाल के फैन्स को निराशा ही हाथ ही आने वाली है |

कहनी की बात करे तो लेखक निर्देशक फारूक कबीर कुछ ऐसा नहीं दिखा पाए जिससे पब्लिक में रोमांच पैदा हो (जैसा की ट्रेलर  लग रहा था)। खुदा हाफ़िज़ की कहनी जिस प्लाट  पर बनी है हम उसे पहले भी कई फिल्मो में देख चुके है। कुछ महीनो पहले टाइगर श्रोफ  की फिल्म बागी 3 की बात करे तो उस फिल्म की कहानी भी लगभग इसी ट्रैक पर ही बनी थी बस फर्क है टाइगर अपने भाई को बचाने जाता है और इस फिल्म में समीर (विद्युत जामवाल ) अपनी बीवी नर्गिस को | 

लेकिन बागी 3 फिल्म का एक्शन बहुत ही जाएदा जबरदस्त था | हालाँकि कहनी उस फिल्म की वीक थी लेकिन एक्शन वो कमी को पूरा कर देता है | जो की खुदा हाफ़िज़ नहीं कर पाई |

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खुदा हाफ़िज़ की कहनी

खुदा हाफ़िज़ फिल्म शुरू होती है समीर चौधरी (विद्युत् जामवाल ) से जो नोमन देश में पुलिस कस्टडी (Police custody) में है | जिससे मिलने नोमन(काल्पनिक देश) के राजदूत आई .के. मिश्रा मिलने आते है जो समीर से कहते है की वो तभी तुम्हारी मदद कर सकते जब तुम अपनी सच्ची कहनी बातये |

कहनी यहाँ से फ़्लैश बेक में जाती है और खनऊ शहर पहुचती है जहाँ नर्गिस (शिवालीका ओबेराय) और समीर चौधरी (विद्युत् जामवाल) गैर धर्म के होने के बावजूद शादी करते है | समीर एक छोटी सी सॉफ्टवियर कम्पनी चलता है तो वही नर्गिस भी कॉल सेंटर में HR की जॉब करती है | सब कुछ अच्छा चल रह था लेकिन 2008 में आई मंदी में दोनों की नौकरी चली जाती है | (ये भाग फिल्म में थोडा सा एहसास जगाता है)

3 महीने गुजर जाने के बाद दोनों ट्रेवल एजेंट के द्वारा नोमन में नौकरी करने की अर्जी भरते है | लेकिन नर्गिस का नौकरी का लेटर आ जाता है और वो अकेले ही नोमन देश के लिए रवाना हो जाती है | जहाँ वो जिस्मफरोशी के बड़े रेकेट में फंस जाती है और एक दिन अचानक समीर को फोन कर के अपनी आपबीती बताती है लेकिन अचानक फोन कट जाता है।  

जिसके बाद अपना हीरो समीर(विद्युत् जामवाल) नोमन के लिए रवाना हो जाता है | जहाँ उसकी मुलाकात टैक्सी ड्राईवर उस्मान हामिद (अनु कपूर) से होती है जो लोकल होने के नाते उसकी मदद करता  है | उस्मान हामिद की मदद से समीर अपनी बीवी नर्गिस तक पहुंच तो जाता है लेकिन उसे छुड़ा नहीं पता | वतन से दूर पराये देश में समीर अपनी बीवी नर्गिस को कैसे छुड़ा पायेगा ? क्या वो नोमन देश की कैद से निकल पायेगा ? इसी को जानने के लिए आप डिस्नी हॉट स्टार पर खुदा हाफ़िज़ देख सकते है |




निर्देशन 


खुदा हाफ़िज़ फिल्म को निर्दशन फारूक कबीर ने किया है | निर्देशन के साथ उन्होंने इस फिल्म को लिखा भी है | लेकिन वो विद्युत् जामवाल को न तो अच्छे संवाद, सीन्स दे पाए और ना ही उनके लिए एक्शन पैक्ट सीक्वेंस रच पाए | 

फारुक कबीर को सोचना चाहिए जिस कहनी की बल पर वो विद्युत् जामवाल के ऊपर इतना बड़ा दांव खेल रहे थे उसे पब्लिक पहले ही देख चुकी है | तो उन्हें विद्युत् के लिए बेहतर कहनी सोचनी चाहिये थी | लगता है की फारुक कबीर कन्फ्यूजन में थे की विद्युत् यानि समीर के किरदार को किस तरह के सांचे में ढाला जाये? क्यूंकि एक्शन से दूर वो इस फिल्म में सहमे सहमे से नज़र आये जो विद्युत् की इमेज को सूट नहीं करता |

कुल मिलकर फिल्म फारुक कबीर फिल्म को फुल एंटरटेनमेंट के तडके में नहीं उतार पाए | सबसे बड़ा खुदा हाफ़िज़ के लिए घातक रहा फिल्म का सीधा सपाट होना जो आगे क्या होने वाला है वो पहले ही पता लग जाता है| फिल्म में एक ट्विस्ट है जिसे अंत में देख कर आपको निर्देशक की सोच पे तरस आयेगा | 


फिल्म देखें या नहीं ?

कुल मिलकर फिल्म खुदा हाफ़िज़, पुरानी कहनी को नए पैकिंग पेपर में पैक करके परोसा गया है| जिसे देखकर फारुक कबीर पे गुसा ही आने वाली है | आखिर क्यूँ उसने ये फिल्म बनायीं | औअर रहा सवाल विद्युत् जामवाल को तो फिल्म को साइन करते वक़्त सोचना चाहिये की दर्शक उन्हें क्यूँ पसंद करते है | अब बात रही फिल्म को देखने की या न देखने की तो इतना कुछ जानने के बाद 2 घंटा 14 मिनट अगर आपके पास फालतू है तो खुदा हाफ़िज़ देख सकते है | लेकिन अगर एक्शन फिल्मो के शौक़ीन है तो विद्युत की कमांडो फिल्म की सिरीज़ ही देख ले बेहतर होगा | लेकिन फिर भी मन है देखने का तो कौन रोक सकता है आप लोगो को |