हत्या या आत्महत्या के राज़फ़ाश के साथ भ्रष्ट शिक्षा तंत्र से पर्दा उठाती है फिल्म हलाहल

Eros Now Film Halahal Review: हत्या या आत्महत्या के राज़फ़ाश के साथ शिक्षा तंत्र चल रहे घोटालों और माफियाओ से भी पर्दा उठाती है फिल्म हलाहल| 

हत्या या आत्महत्या के राज़फ़ाश के साथ भ्रष्ट शिक्षा तंत्र से पर्दा उठाती है फिल्म हलाहल

हलाहल समीक्षा

दिनों दिन प्रतिस्पर्धा की दौड़ और भी कठिन होती जा रही है जिसे सरल बनाने के लिए एक नए भ्रष्ट तंत्र प्रणाली ने जनम ले लिया है| आज हर कोई अपने बच्चे को डॉक्टर इंजीनियर बनाना चाहता है चाहे बच्चा उस काबिल हो या न हो| इसी का फाइदा शिक्षा को कारोबार बनाने वाले माफिया उठाते है | जो मोटी रकम लेकर बड़े से बड़े इन्स्टिट्यूशन मे दाखिला दिलवाते है | हलाहल फिल्म शिक्षा तंत्र मे फैले जहर को उजागर करती है | वैसे फिल्म मे ऐसा कुछ नहीं है जिसे आपने पहले काभी देखा ना हो |

फिल्म की कहानी को लेखक जीशान कादरी और जिब्रान नूरानी ने काल्पनिक किरदारों के साथ शिक्षा भर्ती घोटाले को दिखाने की कोशिश की है | कहानी मे एक मेरिट होल्डर मेडिकल स्टूडेंट की हत्या हो जाती है जिसे आत्महत्या का रूप दे दिया जाता है | 

जिसकी गुथी सुलझाते –सुलझाते एक बाप कैसे शिक्षा माफियाओं के गिरेबा तक पहुच जाता है| फिर क्या वो इन भ्रष्ट तंत्र से मुकाबला कर पाएगा ? क्या वो अपनी बेटी को इंसाफ दिला पाएगा ? या खुद इस भ्रष्ट तंत्र मे कही खो जाएगा ? इन्ही तमाम सवालों का जवाब देती है हलाहल फिल्म | इसे देखने के लिए आपको eros now पर स्ट्रीम करना होगा |

हलाहल फिल्म की निर्देशन की कमान रणदीप झा (Randeep jha) ने कोशिश तो बहुत की फिल्म को बांधकर रखे अंत तक लेकिन लेखक जीशान कादरी और जिब्रान नूरानी की काल्पनिक कहानी मे वो दम नहीं था | फिल्म की कहानी आधे घंटे के बाद पकड़ छोड़ देती है |

खासकर फिल्म मे किरदारों पर काम अच्छे से नहीं किया गया है| इसलिए सभी अधूरे से लगते है| बाकी फिल्म की थीम अच्छी है लेकिन अधपकी हुई है | बस सचिन खेडेकर और बरून सोबती का अभिनय फिल्म को अंत तक देखने के लिए आपको रोके रखते है बाकी फिल्म मे ऐसा कुछ खास नहीं है जिसे आपने पहले काभी देखा ना हो |


हलाहल की कहानी

जब से ओओटी प्लेटफॉर्म पर समय को भरने का चलन चला है तब से हिन्दी फिल्मे और वेब सीरीज मे छोटे शहरों की कहानियां को ज़्यादा तरजीह मिलने लगी है| जो दर्शकों को सीधे कनेक्ट करता भी है |

हलाहल फ़िल्म भी एक ऐसे ही छोटे से शहर गाजिबाद पर आधारित है। कहानी का काल्पनिक आधार गाजिबाद मेडिकल कॉलेज को बनाया गया है | जहां रोहतक के जाने माने डॉक्टर शिव शंकर शर्मा (सचिन खेडेकर ) की मेरिट होल्डर लड़की अर्चना शर्मा (एनब खिर्जा) पढ़ती है | अर्चना पढ़ने मे काफी अच्छी है इसलिए वो पढ़ने के साथ मेडिकल कोचिंग मे पढ़ती भी है|

फ़िल्म की कहानी शुरू होती है की अर्चना किसी के पीछे भाग रही है वो कह रही है की वो पेन ड्राइव उसे वापस कर दे साथ ही कुछ गुंडे उनके पीछे लगे हुए है| जहां वो लोग उसको मार कर जला देते है |

उसके बाद पुलिस इस केस को आत्महत्या बताकर बंद करना चाहती है | जहां डॉक्टर शिव शंकर शर्मा कहते है की आप बिना अटॉपसी के कैसे कह सकते है की सुसाइड है | उनका मानना है की उनकी बेटी सुसाइड नहीं कर सकती | वो इस केस की तह तक जाना चाहते है जिसमे उनकी मदद पुलिस ऑफिसर युसुफ(बरून सोबती) करता है | लेकिन बरुन का चरित्र भी पाक-साफ नहीं है वो पैसों के लिए सब कुछ दाव पर लगा सकता |

दोनों की गुपचुप जांच आगे बढ़ती है तो उन्हे साफ हो जाता है की अर्चना ने आत्महत्या नहीं की है बल्कि उसे मार गया है | जिसके पीछे शिक्षा माफिया का बड़ा गिरहों का हाथ है | लेकिन उनके पास कोई पुख्ता सुबूत नहीं है जिससे वो उस गिरहों का पर्दाफाश कर सके | (बस कहानी यही से भटकाना शुरू होती है तो अंत तक पटरी प नहीं आती है )

शिव शर्मा और युसुफ जिस राज़ के सिरे तक पहुचते भी है तो उसका कत्ल हो जाता है | अब क्या दोनों इस भ्रष्ट शिक्षा तंत्र से मुकाबला कर पाएंगे ? जहां राजनेता,पुलिस और माफिया का मिलजुला खेल चल रहा है | क्या डॉक्टर पिता शिव अपनी बेटी को इंसाफ दिला पाएंगे ?

फिल्म कई कहानी पूरी इसी के इर्द गिर्द ही घूमती है | बस कहानी मे कुछ किरदार अधूरे रह जाते है जिन्हे स्टेबलिश होने का मौका नहीं मिला| लेकिन कहानी का अंत फिल्म के टाइटल हलाहल को जस्टिस करता है |

आपको बता दे की हलाहल का अर्थ है की किसी चीज का धीरे – धीरे जहर हो जाना | जो की इस फिल्म मे दिखाया गया है |